ज़माना कभी एक जगह नहीं ठहरता; वक़्त एक दरिया है जो बहता है तो मंज़र बदल जाते हैं, रुक जाए तो ज़िंदगी रुक जाए। इंसान हमेशा आने वाले कल के दहाने पर खड़ा रहता है, एक सवाल के साथ। चंद सालों के बाद दुनिया कैसी होगी? यह सवाल महज़ पेशीनगोई नहीं, बल्कि इंसान के मुस्तक़बिल का आइना है। आज हम इसी आइने में झाँकने की कोशिश करते हैं, इस उम्मीद के साथ कि शायद आने वाला ज़माना हमारे तख़य्युल से भी आगे हो, दुनिया का चेहरा बदल रहा है। टेक्नोलॉजी अब घोड़े की तरह नहीं, बिजली की तरह दौड़ रही है। मसनोई ज़ेहानत मददगार नहीं रही; अब वो रहबर बनती जा रही है। रोबोट सिर्फ़ घरों में झाड़ू नहीं लगाएंगे, वो इंसान के साथ बैठ कर फ़ैसले करेंगे। शहर खुदकार हो जाएंगे। सड़कें गाड़ियों से बात करेंगी। घड़ियाँ जिस्म का हाल बताएंगी। मोबाइल फ़ोन क़िस्सा हो जाएंगे; उनकी जगह चेहरे से जुड़ी शीशे, जिल्द में पैवस्त बारीक चिप्स, या गर्दन पर पहनी जाने वाली शफ़्फ़ाफ़ स्क्रीनें ले लेंगी। इंटरनेट ऑक्सीजन बनेगा, नज़र न आए मगर हर जगह मौजूद होगा। फ़ासले मिट जाएंगे, मगर दिलों की दूरियाँ बढ़ सकती हैं।
     आने वाली दुनिया की इमारतें वो नहीं रहेंगी जो आज हैं। ईंट और पत्थर की जगह ऐसे स्मार्ट मटेरियल आएंगे जो खुद दर्जा-ए-हरारत समझेंगे, फ़ज़ा साफ़ करेंगे, और सूरज की रौशनी जज़्ब कर के रात में नर्म रौशनी बिखेर देंगे। शहर ऊपर उठेंगे और कुछ इमारतें नीचे उतर आएंगी। फ़ज़ाओं में झूलते पुल, ज़ेर-ए-ज़मीन तिजारती रास्ते, और हवा में तैरती बरक़ी बसें रोज़मर्रा का मंज़र होंगे। खिड़कियाँ रौशनी खुद एडजस्ट करेंगी, दरवाज़े हिफ़ाज़ती निज़ाम खुद फ़ाल करेंगे, और कमरों की हवा खुदकार तौर पर ताज़ा होती रहेगी। छतों पर बाग़ात होंगे और दीवारों में सोलर खलीए नसब होंगे। घरों के सामान खुद सफ़ा होंगे; आग से पहले पानी का निज़ाम फ़ाल हो जाएगा; मौसम सख़्त हो तो इमारतें हरारत अपने अंदर महफ़ूज़ रख लेंगी, गाँव और क़स्बे भी बदले होंगे। छोटे घरों में स्मार्ट आलात आम होंगे। आबपाशी खुदकार होगी। खाद ड्रोन के ज़रिए दी जाएगी। बारिश के हर क़तरे को महफ़ूज़ करने के निज़ाम फैल जाएंगे। खेत मिट्टी से अलग, मशीनों से जुड़ेंगे। फ़सलें उमूदी खेतों में उगेंगी। पौधे इमारतों में लटकेंगे। बीज लेबोरेट्री में बनेंगे। बग़ैर ज़मीन के ज़राअत, बग़ैर सूरज के रौशनी, बग़ैर बारिश के पानी, यह नई काश्तकारी का चेहरा होगा, सेहत का इंक़लाब क़रीब है। मसनोई दिल, मसनोई गुर्दे, मसनोई आँखें आम होंगी। जीन एडिटिंग बीमारियों को जन्म लेने से पहले मिटा देगा। कैंसर जैसे मूज़ी अमराज़ पीछे हटेंगे। मगर इलाज की यह ताक़त अख़लाक़ी सवालात को जन्म देगी: इंसान इलाज में आगे है, लेकिन अख़लाक़ कहाँ है? सहूलतें बढ़ेंगी, मगर सवाल बाक़ी रहेगा कि क्या आसानी रूह को कुंद कर देगी?
       तिजारत का मंज़र भी बदल जाएगा। नोट कम होंगे; करेंसी डिजिटल हो जाएगी। दुकानें सिकुड़ेंगी, ऑनलाइन बाज़ार बढ़ेंगे। रोज़गार बदल जाएगा। डिग्री की जगह महारत क़ीमत बन जाएगी। जिन के पास हुनर होगा, वो बचेंगे; जो पीछे रहेंगे, वक़्त के धक्के खाएंगे। दौलत कम हाथों में जमा होने का इमकान बढ़ेगा, मगर टेक्नोलॉजी नई नौकरियां भी लाएगी, मौसम का मिज़ाज ख़राब है। ज़मीन नाराज़ हो रही है। गर्मी बढ़ेगी, बारिशें बे वक़्त होंगी, समुंदर बुलंद होंगे, फ़सलें कम होंगी। अगले दस साल यह बुहरान गहरा हो सकता है। इंसान को कुदरत के साथ नरमी व इंसाफ़ से पेश आना होगा वरना आज़माइश सख़्त होगी, खलई दौर भी क़रीब है। चाँद पर बस्तियाँ बनेंगी, मريخ पर तजरबात होंगे, ख़ला की सियाहत आम होती जाएगी। ज़मीन के बाद अगला घर तलाश करने की कोशिश बढ़ेगी। इंसान ऊपर देखेगा, ऊपर चलेगा, और ऊपर सोचेगा।
      फ़िल्मी दुनिया का भी रंग बदल जाएगा। पर्दा एक दीवार तक महदूद नहीं रहेगा। फ़िल्म देखते वक़्त किरदार कमरे में चलते फिरते महसूस होंगे। वर्चुअल अदाकार इंसानों से ज़्यादा मक़बूल होंगे। स्टूडियोज़ ख़ला में सेट बनाएंगे। ड्रामे सिर्फ़ स्क्रीन पर नहीं, कभी कभार इंसान के ज़ेहन में बराहे रास्त दाख़िल होंगे, लिबास का तसव्वुर बदल जाएगा। कपड़े सिर्फ़ जिस्म ढाँपने के लिए नहीं, जिस्म संभालने के लिए होंगे। माहौल के मुताबिक़ रंग बदलने वाले कपड़े, थकन को चूस लेने वाले रेशे, और गर्मी सर्दी को खुद एडजस्ट करने वाले मलबूसात आम होंगे। सवारियाँ आसमान पर उड़ेंगी। सड़कों का बोझ कम होगा; गाड़ियाँ ख़ामोशी से खुद चलेंगी। ड्रोन टैक्सियाँ छतों से उड़ान भरेंगी। ज़ाती उड़न गाड़ियाँ अमीरों का शौक़ नहीं रहेंगी, आम इंसान की ज़रूरत बन जाएंगी। लंबे सफ़र ख़ला के किनारे से गुज़रते हुए चंद घंटों में मुकम्मल होंगे, जंगों का चेहरा सबसे ज़्यादा बदल जाएगा। मैदान ख़ाली होंगे; कंप्यूटर मैदान-ए-जंग बन जाएंगे। फ़ौजें कम होंगी, मशीनें ज़्यादा। जंगें बंदूक़ से नहीं बल्कि डेटा से लड़ी जाएंगी। साइबर हमले तोपों से ज़्यादा ख़तरनाक होंगे। बग़ैर पायलट के जहाज़, बग़ैर सिपाही के टैंक, बग़ैर हुक्म के हमले, यह सब मुमकिन होगा। मगर सवाल यही रहेगा: क्या इंसान सीखेगा कि अमन ही असल कुव्वत है?
     शादियों का अंदाज़ भी बदलेगा। दावतें मुख़्तसर, फ़ैसले तेज़, रसूमात सादा होंगी। लोग फ़ासले के बावजूद जुड़ जाएंगे, मगर रिश्तों की गहराई का इम्तिहान सख़्त होगा। निकाह ऑनलाइन मुमकिन होगा; मुशावरत डिजिटल होगी; मगर एतमाद और मुहब्बत हमेशा दिल से ही जन्म लेंगी। सियासत का नक़्शा मिट कर नए सिरे से बनेगा। जम्हूरियत में टेक्नोलॉजी का दख़ल बढ़ेगा। मसनोई ज़ेहानत पॉलिसियों का तजिया करेगा। बादशाहतें कम होंगी मगर ताक़त के नए मराकज़ वजूद में आएंगे — डेटा के बादशाह, अलगोरिथ्म के हाकिम, और टेक्नोलॉजी के फ़िरऔन, किताबें अपनी ख़ुशबू नहीं खोएंगी, मगर शक्ल बदल जाएगी। काग़ज़ कम होगा, स्क्रीन ज़्यादा। किताब का दिल ज़िंदा रहेगा। इंसान पढ़ेगा, चाहे सफ़्हा उंगली से फेरे या हवा में। तालीम का निज़ाम मज़ीद खुल जाएगा। बच्चे दीवारों वाली क्लास में कम बैठेंगे। असातज़ा का साथ हमेशा ज़रूरी रहेगा, मगर इल्म का सफ़र घर से, दुनिया से, और हत्ता कि ख़ला से भी मुमकिन होगा। स्कूलों की दीवारें कमज़ोर होंगी, इल्म का दरवाज़ा वसीअ होगा।
     हथियारों की नस्ल भी आगे बढ़ेगी। आवाज़ से तेज़, रौशनी से तेज़, और सोच से तेज़ हथियार वजूद में आएंगे। दुश्मन दूर बैठ कर हरा दिया जाएगा। यह तरक़्क़ी ख़ौफ़ज़दा भी करती है और चैलेंज भी। सवाल हमेशा ज़ी रूह है: तकनीक का इस्तेमाल इंसानियत के लिए होगा या तबाही के लिए?
     दौलत और ग़ुर्बत का तनाज़अ बढ़ सकता है। दौलत चंद हाथों में जमा होगी। मगर सही हिकमत अमली और महारत रखने वालों के लिए नए रास्ते खुलेंगे। महारत वाले ऊपर जाएंगे; सिर्फ़ डिग्री वाले पीछे रह जाएंगे। इसी सारी दौड़ में इंसान खड़ा सोच रहा होगा: मैं कहाँ हूँ? मेरी असल क्या है? तरक़्क़ी तो मिल गई, मगर सुकून कहाँ गया?
      रूहानी तलाश बढ़ेगी। मसाजिद आबाद होंगी। क़ुरान दिलों में उतरेगा। नौजवान दीन को नई आँख से देखेंगे। वक़्त का दरिया बहता रहेगा, मुस्तक़बिल बदलता रहेगा। मगर कामयाबी उन्हीं को मिलेगी जो अपनी रूह की आग बुझने न दें, अपने अख़लाक़ का चराग़ रोशन रखें, इल्म को ज़ाद-ए-सफ़र बनाएं, और तब्दीली को दुश्मन नहीं बल्कि साथी समझें।
     दुनिया बदलेगी, हालात पलटेंगे, साइंस तरक़्क़ी करेगी, निज़ाम तबदील होंगे, मगर इस्लाम का रास्ता हमेशा सीधा, महफ़ूज़ और रोशन रहेगा। क़ुरान हमें रौशनी देता है, सुन्नत हमें चलना सिखाती है, और ईमान हमें खड़ा रखता है। आने वाले दस साल कुछ भी लाएं, अगर हम इल्म, अख़लाक़, तक़वा और तवक्कुल के साथ चलेंगे तो दुनिया संवर जाएगी और आख़िरत में सुकून मिलेगा। मुस्तक़बिल अल्लाह के हाथ में है; हमारा किरदार हमारे हाथ में है। यही इस्लाम का सबसे पैग़ाम है।