*क्या होता है ख़ौफ़-ए-ख़ुदा*
मनकूल जनरल नॉलेज,
उत्तरी कोरिया के 73% लोग किसी मज़हब को नहीं मानते,
13% चोंडो मत के पैरोकार हैं,
12% शमन मत के पैरोकार हैं,
1.5% बुद्ध मत के पैरोकार हैं,
जबकि 0.5% अन्य मज़हब से ताल्लुक रखते हैं,
उन्हें इस्लाम के बारे में कोई इल्म नहीं,
एक मुसलमान سیاح वहां गया और एक मुकामी शहरी से दोस्ती हो गई, रमज़ान का महीना था,
जब उस शहरी ने अपने मुसलमान दोस्त को खाने की दावत दी तो उसने कहा:
मैं रोज़े से हूँ, मैं ग़ुरूब-ए-आफ़ताब से पहले कुछ नहीं खा सकता...
कोरियन शख्स ने पूछा रोज़ہ کیا होता है؟
मुसलमान ने जवाब दिया रोज़ہ तुलू-ए-आफ़ताब से ग़ुरूब-ए-आफ़ताब तक कुछ न खाने पीने का नाम है,
यह अल्लाह रब्बुल इज्ज़त ने हम मुसलमानों को अता फरमाया है हम अल्लाह के लिए रोज़ہ रखते हैं भूका रहते हैं इसकी इबादत करते हैं और इसका ख़ौफ़ अपने दिल व दिमाग में रखते हैं।
कोरियन बोला तुम चाहो तो छुप कर खा सकते हो, कोई आपको नहीं देखेगा ना मेरे घर वाला ना कोई और,
मुसलमान ने कहा चाहे कोई देखे या न देखे, अल्लाह देख रहा होता है और वह सज़ा देगा, और यह अल्लाह का हुक्म है कि रोज़े रख लिया तो कुछ नहीं खा सकते ना छुप कर ना खुले में बल्कि एक मुद्दत तक इसी हाल में रहना होगा, वह दोस्त था इसरार कर रहा था बार बार खाने का और उसको मालूम नहीं था कि रोज़ہ क्या है किस को कहते हैं और क्यों रखा जाता है...जब उसने मुसलमान की बात सुनी और मालूम हुआ के अल्लाह के ख़ौफ़ से भूँक, प्यास, सब को छोड़ देते हैं,
यह सुन कर कोरियन शख्स हैरत से कहने लगा:
तो गोया तुम अपने मुल्क में भी अल्लाह के डर से छुप कर कुछ ग़लत नहीं करते गोया वह यह कहना चाहता था आप लोग हर बुराई से पाक होंगे कुछ भी उल्टा सीधा नहीं करते होंगे...
जैसे उसने बयान किया
तो फिर तुम्हारे मुल्क में
कोई जेल नहीं होगी,
कोई करप्शन नहीं,
खाने में मिलावट नहीं,
कोई गंदगी नहीं,
कोई ब्लैक मार्केटिंग नहीं,
बच्चों के साथ ज़्यादती नहीं,
कोई रेप नहीं,
ट्रैफिक क़वानीन की ख़िलाफ़वरज़ी नहीं,
कोई चोर नहीं,
कोई मुनाफ़क़त नहीं,
नकली दवाइयां नहीं,
कोई धोखा बाज़ नहीं,
कोई झूठ नहीं,
कोई जुर्म नहीं,
कोई ग़ैर अख़लाक़ी सरگرمियां नहीं,
कोई वालिदैन का ना फरमान नहीं,
कोई किसी को मारने डांटने वाला नहीं,
सिर्फ़ और सिर्फ़ अमन ही अमन होगा,
क्योंकि एक ऐसा मुल्क जहां लोग महज़ अल्लाह के ख़ौफ़ से छुप कर भी खाने से गुरेज़ करते हैं, वहां तो कोई जुर्म हो ही नहीं सकता, वहां लोग कैसे किसी को तकलीफ दे सकते हैं, बुरा भला कह सकते हैं, और जब एक खाने और पीने जैसी ज़रूरत से रुक सकता है तो गोया वह हर बुरे काम से रुक सकता है....
कोरियन आँखों में आंसू लेकर बोला भाई क्या؟
आप मुझे वहां ले जा सकते हैं, जहां इतना अच्छा सुकून हो, इतना अच्छा इंतिज़ाम हो, कि ग़लत काम से पहले उससे डरें जो कि तन्हाई में भी देख लेता है और ख़ौफ़ ऐसा कि भूख और प्यास जैसी चीज़ से रुक जाए जिसके लिए कितने जतन करता है इंसान, भाई हमारे मुल्क में तो बात बात पर लड़ाई होती है, तकलीफ दी जाती है, और कोई खाना पीना बंद नहीं करता, चोरी, ग़ीबत, बुरा भला, ज़िना, झूठ, दग़ा ख़यानत, ज़ुल्म, जहल, हसद व कीना, क़त्ल व ग़ारत, यह सब बातें तो आम हैं...
उसने ग़ौर किया और कुछ लम्हे सोच कर उसने मुसलमान से कहा भाई ले जाओगे؟
जवाब दिया भाई कैसे ले जाऊं आप एक काम करो मुसलमान हो जाओ फिर आप भी डरना,
वह बोला भाई क्या बात कह रहे हो मैं यहां रह कर भी डर सकता हूँ؟ मुसलमान ने कहा जी भाई.
फिर बोला भाई कैसे؟
उसने कहा आपको अल्लाह को एक मानना होगा बोला ठीक है मानता हूँ.
यूँ समझिए उसने उसे कलमा पढ़ाया और मुसलमान कर दिया फिर सब बातें उसे सिखाई और अल्हम्दुलिल्लाह वह मुसलमान हो गया और उन तमाम बातों को उसने छोड़ दिया जो ख़ुराफ़ात वह किया करता था...
यक़ीनन यही है इस्लाम की हक़ीक़त, यही है इस्लाम का शेआर, यही है इस्लाम की तालीम, लेकिन अफ़सोस सद अफ़सोस, कि इसको रोज़ہ तो समझा दिया गया लेकिन अब मुसलमान किस से डरते हैं और अल्लाह से कितना डरते हैं मैं बयान नहीं कर सकता, अल्लाह करीम मुसलमानों को खोया हुआ वक़ार लौटा दे...
जब मैं इसको पढ़ कर लिख रहा था तब मेरे एक अज़ीज़ मेरे पास आए और बोले इसका तो अभी मौका भी नहीं है लिख लो रमज़ान के वक़्त नश्र कर देना मैंने भाई पता नहीं फिर याद रहा या ना रहा और मैं ने लिख दिया, असल मक़सद ख़ौफ़-ए-ख़ुदा को बयान करना है, वह इसे में नज़र आ रहा है कभी कभी चीज़ें ख़िलाफ़ मौका महल नसीहता रख दी जाती हैं...
माहसिल
ख़ुदा क़सम उस बंदे ने बयान कर दिया कि डर किस को कहते हैं और ख़ौफ़-ए-ख़ुदा क्या होता लेकिन यह सब रस्म हैं अब तो रोज़ہ रख कर लोग नमाज़ भी नहीं पढ़ते, काश ख़ौफ़-ए-ख़ुदा हमारे दिलों में होता, हमारे वजूद में होता, हमारी तन्हाई में होता, या अल्लाह तू हमें अपना ख़ौफ़ अता फरमा आमीन बिजाह अन्नबी अल करीमﷺ.....
हक़ीक़तन आँखें खोल देने वाली बात है हम तमाम मुसलमानों की और सबक हासिल करना चाहिए, अल्लाह करीम हमारी हिफ़ाज़त फरमाए आमीन या रब्बुल आलमीन...
तालिब-ए-दुआ-ए-ख़ैर मुहम्मद मुज़म्मिल
✍️ मुतअल्लिम अल जामिया अल अशरफिया✍️