गणतंत्र दिवस: याद, मुहासबा, अहद

✍: जलील अल-कासमी
नायब काज़ी व उस्ताद मदरसा
बद्र अल-इस्लाम बेगुसराय, बिहार

26 जनवरी, गणतंत्र दिवस, महज एक तारीख नहीं बल्कि हिंदुस्तान की इज्तिमाई रूह, उसके ज़मीर और उसके आईनी शऊर की अलामत है। यह वह तारीखी लम्हा है जब इस सरज़मीन ने एक ऐसे दस्तूर को नाफ़िज़ किया जो इंसान की इज्ज़त, मसावात, इंसाफ़ और आज़ादी का ज़ामिन है। आईन-ए-हिंद ने ज़ात, नस्ल, रंग, ज़बान, तहज़ीब और मज़हब की तमाम तफ़रीक़ से बुलंद हो कर हर हिंदुस्तानी को अपने अक़ीदे, रिवायत और सकाफ़त के मुताबिक़ आज़ादी के साथ जीने, सोचने, बोलने और अमल करने का हक़ अता किया, बाल्खुसूस अकलियतों और कमज़ोर तबक़ात के हुक़ूक़ के तहफ़्फ़ुज़ को अपनी बुनियादी रूह क़रार दिया।
आज़ाद हिंदुस्तान की तारीख में 15 अगस्त 1947 और 26 जनवरी 1950 को गैर मामूली अहमियत हासिल है। 15 अगस्त वह दिन है जब "भारत आज़ादी एक्ट" के तहत हम ने अंग्रेज़ों की ग़ुलामी से निजात पाई, और 26 जनवरी वह दिन है जब 1935ء के नोआबादीयाती दस्तूर को मंसूख़ करके एक खुदमुख्तार, जम्हूरियत और आईनी रियासत के तौर पर हिंदुस्तान ने अपने सफ़र का बाज़ाब्ता आग़ाज़ किया। अगरचे दस्तूर साज़ असेंबली ने आईन को 26 नवंबर 1949ء को मंज़ूर कर लिया, मगर इस के नफ़ाज़ के लिए 26 जनवरी का इंतख़ाब इस लिए किया गया कि 26 जनवरी 1930ء को इंडियन नेशनल कांग्रेस ने पहली बार मुकम्मल आज़ादी की क़रारदाद मंज़ूर की थी। यूं यह दिन ग़ुलाम हिंदुस्तान की जद्दोजहद और आज़ाद हिंदुस्तान के आईनी वक़ार, दोनों का अमीन बन गया।
इस मौक़ा पर हम उन अज़ीम मेमारान-ए-आईन-ए-हिंद को ख़िराज-ए-तहसीन पेश करते हैं, जिन्होंने एक कसीर मज़हबी, कसीर तहज़ीबी और कसीर लिसानी समाज के लिए ऐसा दस्तूर मुरत्तब किया, जो दुनिया की सब से बड़ी जम्हूरियत की बुनियाद बना। इसी के साथ हम उन जानबाज़ मुजाहिदीन-ए-आज़ादी को भी अक़ीदत के फूल पेश करते हैं जिन के खून पसीने से आज़ादी की शमा रोशन हुई। शेख अल-हिंद मौलाना महमूद हसन देवबंदीؒ और शेख अल-इस्लाम मौलाना हुसैन अहमद मदनीؒ की माल्टा की असीरी, भगत सिंह की इंकलाबी क़ुरबानी, सरदार वल्लभ भाई पटेल की आहनी क़ियादत, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की फिक्री रहनुमाई, अशफ़ाक़ उल्लाह खान की शहादत और बाबाये क़ौम महात्मा गांधी की अदम तशद्दुद पर मबनी जद्दोजहद—यह सब हमारी क़ौमी तारीख के दरख़्शां और नाक़ाबिल-ए-फ़रामोश बाब हैं। हम उन तमाम मारूफ़ और गुमनाम मुजाहिदीन-ए-आज़ादी को यकसां अक़ीदत के साथ याद करते हैं जिन्होंने वतन की ख़ातिर अपनी जान, अपना सुकून और अपने ख़्वाब क़ुरबान कर दिए।
यौम-ए-जम्हूरिया के मौक़ा पर दिल्ली में मुनाक़िद होने वाली शानदार परेड, तिरंगे की शान दार लहर, और दुनिया के मुअज़्ज़ज़ मेहमानों की मौजूदगी हमारी ताक़त, खुदमुख्तारी और आलमी वक़ार का मज़हर होती है। पूरे मुल्क में ख़ुशी, फ़ख़्र और मसर्रत का माहौल होता है, और कुछ लम्हों के लिए हम अपनी रोज़मर्रा की तल्ख़ियों को फ़रामोश कर देते हैं। मगर दर हक़ीक़त यह दिन सिर्फ जश्न का नहीं, बल्कि यौम-ए-याद, यौम-ए-मुहासबा और यौम-ए-अहद है।
यह दिन हम से मुतालबा करता है कि हम उन मुजाहिदीन-ए-आज़ादी को याद करें जिन के नाम तारीख के औराक़ में दर्ज हैं, और उन्हें भी जिन्हें दानिस्ता या नादानिस्ता फ़रामोश कर दिया गया। आज़ादी के पचास साल मुकम्मल होने पर क़ाज़ी मुजाहिद अल-इस्लाम क़ासमीؒ का “कारवान-ए-आज़ादी” इसी शऊर की एक रोशन मिसाल था, जिस के ज़रीये गुमनाम मुजाहिदीन को तारीख के उफ़क़ पर दोबारा नुमायां किया गया। आज ज़रूरत है कि इस काम को मज़ीद आगे बढ़ाया जाए, मज़ामीन, मक़ालात और तहक़ीक़ी काम के ज़रीये इन शहीदों को तारीख में उन का जायज़ मक़ाम दिलाया जाए, खुसूसन इस दौर में जब तारीख को मस्ख़ करने और बाज़ तबक़ों, बाल्खुसूस मुस्लिम मुजाहिदीन-ए-आज़ादी, को निसाब और क़ौमी हाफ़िज़े से मिटाने की कोशिशें हो रही हैं।
यौम-ए-जम्हूरिया हमें यह सोचने पर भी मजबूर करता है कि आया हमारी जम्‍हूरी अक़दार और अमली रवैयों में वाक़ई हम आहंगी बाक़ी है या नहीं? क्या पार्लियामेंट और असेंबलियां वाक़ई अवाम की आवाज़ हैं या महज सियासी कश्मकश के मैदान? क्या जम्हूरियत और सेकुलरज़म हमारे तर्ज़-ए-फ़िक्र और तर्ज़-ए-अमल में ज़िंदा हैं या सिर्फ नारों तक महदूद हो चुके हैं? आज़ादी के बाद हम ने तालीमी, इक्तेसादी और समाजी मैदान में कहां कामयाबी हासिल की, और कहां हम पीछे रह गए—यह सब सवालात हमारे संजीदा मुहासबे के तालिब हैं।
मुस्तक़बिल के हवाले से यह दिन हम से एक वाज़ेह अहद चाहता है कि हम आईन-ए-हिंद के तहफ़्फ़ुज़ व बक़ा को अपनी अव्वलीन ज़िम्मेदारी समझेंगे; जम्‍हूरी रिवायत, आईनी क़द्रों और क़ौमी यकजहती पर आंच नहीं आने देंगे; तालीम को तरक़्क़ी की कुंजी बना कर मुल्क की तामीर में फ़आल किरदार अदा करेंगे; और यह कि हर सतह—रियासत, ज़िला, तालीमी इदारों, स्कूलों और मदारिस—में यौम-ए-जम्हूरिया को महज रस्म नहीं बल्कि शऊरी तरबियत और इज्तिमाई अहद का दिन बनाएंगे।
इसी उम्मीद, शऊर और मुहब्बत-ए-वतन के जज़्बे के साथ हम पूरे मुल्क के बाशिंदगान को यौम-ए-जम्हूरिया की दिल की गहराईयों से मुबारकबाद पेश करते हैं, और यह अहद दोहराते हैं कि एक मज़बूत, मुंसिफ़, पुरअमन और ख़ुशहाल हिंदुस्तान की तामीर में अपना किरदार पूरी दियानतदारी के साथ अदा करते रहेंगे। 26/02026