आज के इस दौर में जो दीन बिलकुल हम ने छोड़ दिया है वो जिहाद है।
माज़ी में क़ादियानी फ़ितना की कोशिश भी इसी पर ही थी कि मुसलमानों से जिहाद को ख़त्म कर दिया जाए।
यह अमल उमूमन मुसलमानों से छूट चुका है। जिस को ज़िंदा करना वक़्त की अहम ज़रूरत है।
इसी के पेशे नज़र हम ने एक सिलसिला वार यह काम शुरू किया है।
तमाम साथी इसे समझें भी। और अगर कोई सवाल हो। तो आप नीचे दिए गए ऑप्शन में पूछ सकते हैं।
आइये इस बार फ़ितना क़ादियानियत के इस प्रोपगंडा के ख़िलाफ़ जिहाद जैसे अज़ीम अमल से रूगरदानी छोड़ कर अपने लिए शहादत की दुआएं करें।
और अदवान अस्सलाम पर एक बार फिर बिजली बन के कड़कें।
जिहाद का लुग़वी मअनी।
जिहाद जहद से मुश्तक है (।मीम के पेश के साथ) या जहद
से मुश्तक है। (मीम के ज़बर के साथ)। इस के मअनी खूब मेहनत और मुशक़्क़त के हैं। लुग़त की किताबों में जिहाद के लुग़वी मअनी को इन अल्फ़ाज़ में बयान किया गया है।
.)अल जिहाद :।(इस्तिफ़राग़ मा फी अल वाक़े वत ताक़ा मिन क़ौल आऊ फ़ेल
जिहाद कहते हैं: जो कुछ इंसान के बस में हो वो कर गुज़रना ज़बानी तौर पर या अमली तौर पर।
जारी है٫٫٫٫٫٫٫