सपने में मदीना की आरज़ू — एक आशिक़ का 💖✨🤌🏻🥹 खामोश सफर
चंद मंज़र ऐसे होते हैं जो ज़बान से ज़्यादा दिल से गुफ़्तगू करते हैं। एक शख्स सुकून से महव-ए-ख्वाब है, मगर उसके दिल की बेदारी उसके तसव्वुर से अयां है। उसके ख्यालों में वो सरज़मीन आबाद है जिसे अहले ईमान अपनी जानों से ज़्यादा अज़ीज़ रखते हैं। यही मंज़र दिल में ये दाइया पैदा करता है कि इस कैफियत को अल्फाज़ का जामा पहनाया जाए।
मदीना-ए-मुनव्वरा वो मुक़द्दस बस्ती है जिसे अल्लाह ताला ने अपने महबूब ﷺ की हिजरत और कयाम के लिए मुंतखब फरमाया। यही वो शहर है जहां ईमान को पनाह मिली, जहां से हिदायत की किरणें पूरी दुनिया में फैलीं। Qur'an में मुहाजरीन व अंसार की फजीलत बयान हुई, और यही वो सरज़मीन है जिसने उन मुक़द्दस नफूस को अपने दामन में जगह दी।
हज़रत Muhammad ﷺ से मोहब्बत ईमान का जुज़ है। और अहले मोहब्बत के दिलों में मदीना की आरज़ू एक फितरी तड़प की सूरत में मौजज़न रहती है। बसा औकात इंसान जिस्मानी तौर पर अपने बिस्तर पर महव-ए-इस्तराहत होता है, मगर उसका दिल रौज़ा-ए-अकदस के सामने हाज़िरी की तमन्ना में जाग रहा होता है। ये कैफियत महज ख्वाब नहीं, बल्कि मोहब्बत की अलामत है।
अहले इल्म फरमाते हैं कि सच्ची मोहब्बत वो है जो इंसान को इत्तेबा-ए-सुन्नत पर आमादा करे। अगर मदीना की आरज़ू दिल में है तो इसका तकाज़ा ये है कि इंसान अपने किरदार, गुफ्तार और मामलात में सुन्नत-ए-नबवी ﷺ को इख्तियार करे। महज तसव्वुर काफी नहीं, बल्कि अमल इस मोहब्बत की सच्ची दलील है।
ये खामोश सफर दरअसल दिल का सफर है। जब आंख बंद होती है तो दुनिया के हंगामे पीछे रह जाते हैं, और दिल अपने महबूब की तरफ मुतवज्जेह हो जाता है। इस लम्हे की कद्र करनी चाहिए, क्योंकि यही वो साअत है जब इंसान अपने रब के हुज़ूर दुआ कर सकता है कि ए अल्लाह! हमें भी उस मुक़द्दस शहर की हाज़िरी नसीब फरमा और अपने महबूब ﷺ की शफाअत से सरफराज़ फरमा।
खुलासा ये कि ख्वाब में मदीना की आरज़ू एक आशिक़-ए-रसूल ﷺ के दिल की गवाही है। मगर इस आरज़ू को हकीकत बनाने का रास्ता इत्तेबा, इताअत और इखलास से हो कर गुजरता है। अल्लाह ताला हमें सच्ची मोहब्बत और उसके तकाज़ों को पूरा करने की तौफीक अता फरमाए।
🌸 वल्लाहू आलम बिस्सवाब 🌸