क्या हमने कभी गौर किया कि हम रोज़ा तो रखते हैं मगर कैसे?
क्या सिर्फ़ भूखे प्यासे रहने का नाम ही रोज़ा है?
क्या सिर्फ़ सहर व इफ़्तार के दस्तरख़्वान सजाने का नाम ही रोज़ा है?
क्या आपने रोज़े की अहमियत और उसके मक़ासिद पर ग़ौर किया रोज़े का मक़सद सिर्फ़ आपको भूखा प्यासा रखना नहीं है बल्कि रोज़े के मक़सद को बयान करते हुए क़ुरान में अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त का फ़रमान है:
يا أيها الذين آمنوا كتب عليكم الصيام كما كتب على الذين من قبلكم لعلکم تتقون`(ए ईमान वालों! तुम पर रोज़े फ़र्ज़ किए गए हैं जैसा कि तुम से पहले लोगों पर फ़र्ज़ किए गए थे शायद कि तुम परहेज़गार हो जाओ/शायद कि तुम तक़वा इख़्तियार करो)`
यह है रोज़े का मक़सद और हम क्या करते हैं हमारा रोज़ा कैसा होता है?
हम रोज़ा भी रखते हैं लड़ाई भी करते हैं, हम रोज़ा भी रखते हैं ग़ीबत भी करते हैं, हम रोज़ा भी रखते हैं झूठ भी बोलते हैं, हम रोज़ा भी रखते हैं गाली भी देते हैं, हम रोज़ा भी रखते हैं और ख़ल्वत व जल्वत में गुनाहों से भी नहीं बचते, हम रोज़ा भी रखते हैं और दिल हसद, बुग़्ज़, कीना से पाक नहीं.!
ग़रज़ कि हम किसी भी ग़लत काम से नहीं रुकते बस रोज़ा रखते हैं और हमें लगता है बस हो गया हमारा रोज़ा, यही है रोज़ा कि बस दिन भर भूखे प्यासे रह लिया और चाहे जो मर्ज़ी करते रहें रमज़ान का रोज़ा रख कर तक़वा के इतने क़रीब हो कर भी हम इस से दूर रहते हैं रोज़े की लज़्ज़त से महरूम होते हैं बग़ैर सोचे समझे ज़बान से किसी भी तरह के अल्फ़ाज़ निकालते रहें, सुबह शाम गालियाँ देते रहें, गाने सुनते रहें, फ़हश फ़िल्में फ़हश मनाज़िर देखते रहें, आँखों की ख़ियानत करते रहें, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि हम किस महीने में हैं किस क़दर क़ीमती साअतों को बर्बाद कर रहे हैं, न दिल में अल्लाह की मुहब्बत है और न ख़शियत इलाही, जब रोज़े का मक़सद ही फ़ासिद हो जाए फिर रोज़ा कैसा?
रोज़ा रखें और गुनाहों से भी न बचें यह कैसा हमारा रोज़ा है??
रमज़ान अज़्मत वाला महीना है यह रमज़ान की ताज़ीम नहीं है, और ना ही यह रमज़ान की तालीमात हैं हम इताअत व इबादत के शौक़ से बिल्कुल ख़ाली हैं, अल्लाह ताला हर हाल से वाक़िफ़ है और रोज़ा यह तालीम देता है कि रोज़ा सिर्फ़ 30 दिनों की गिनती पूरी कर लेने का नाम नहीं है।
बल्कि रोज़ा तो नफ़्स की इस्लाह का महीना है, यह महीना तक़वे का महीना है, यह महीना हमदर्दी व ग़मगुसारी का महीना है, यह महीना इबादत का महीना है, यह महीना ग़रीबों की मदद का महीना है, यह महीना दूसरों के दर्द को महसूस करने का महीना है, यह महीना नेकियाँ कमाने का महीना है, यह महीना अपनी मग़फ़िरत करवाने का महीना है, आप का और हमारा रमज़ान जैसा होगा आइंदा आने वाला साल भी इसी जैसा होगा रमज़ान गुनाहों में गुज़ारा तो आने वाला साल भी गुनाहों में गुज़रेगा और रमज़ान नेकियाँ में गुज़ारा तो आइंदा साल भी नेकियाँ में गुज़रेगा (इन शा अल्लाह अल अज़ीज़)
आइए हम अपने रमज़ान को बेहतर से बेहतर बनाएँ, हम अपने रमज़ान को वैसा गुज़ारें जैसा गुज़ारना चाहिए_
अल्लाह हमें ज़्यादा से ज़्यादा नेकियाँ करने की तौफ़ीक़ दे और हमारी टूटी फूटी इबादत को क़बूल व मंज़ूर फ़रमाए_
आमीन या रब्बुल आलमीन
✍️बिन्त शहाब💫