एक खूबसूरत वाक़या पढ़ा तो आँखें बेसाख्ता नम हो गईं।
सोचा आप की नज़र भी कर दूँ।
हज़रत मसूद बिन मुहम्मद अलहमदानी रहमतुल्लाह अलैह औलिया अल्लाह में एक बुलंद मक़ाम रखते थे - आप पारसा, इबादत गुज़ार और बहुत ही बाअख़लाक़ थे।
आप के आदात व अतवार में एक यह बात भी थी कि अगर कोई उन से ज़्यादती करता या बदाख़लाक़ी का मुज़ाहरा करता तो कभी इंतक़ाम न लेते, माफ़ फ़रमा देते।
अगर कोई कहता कि हज़रत जवाब क्यों नहीं देते?
तो फ़रमाते कि पुरानी बातें याद नहीं की जातीं।
इंतक़ाल के बाद किसी ने ख़्वाब देखा।
पूछा हज़रत क्या बना?
फ़रमाया कि रब तआला ने सामने खड़ा किया और इरशाद फ़रमाया कि मसूद,
पुरानी बातें याद नहीं की जातीं।
जाओ जन्नत में।
अल्लाह अकबर।
या रब्ब लकल हम्द कमा यंबगी लि जलाली वज्हिका व अज़ीम सुल्तानिक।
अल्लाह तआला हमें बाअख़लाक़ और सच्चा मुसलमान बनाए।
कलमा वाली हालत ईमान पर शहादत की मौत नसीब फ़रमाए।
आमीन या रब्बुल आलमीन।