🌻एतिकाफ़-ए-सुन्नत

 

एतिकाफ़-ए-सुन्नत वो है जो सिर्फ रमज़ानुल मुबारक के आख़िरी अशरा में किया जाता है।



🌻एतिकाफ़-ए-सुन्नत के मसाइल

 

[1] रमज़ान के सुन्नत एतिकाफ़ का वक़्त बीसवां रोज़ पूरा होने के दिन गुरुब-ए-आफ़ताब से शुरू होता है और ईद का चाँद नज़र आने तक रहता है। मोतकिफ़ को चाहिए कि वो बीसवें दिन गुरुब-ए-आफ़ताब से पहले एतिकाफ़ वाली जगह पहुँच जाए।



[2] ये एतिकाफ़ सुन्नत-ए-मोअक्कदा अलल किफ़ाया है, यानी बड़े शहरों के मोहल्ले की किसी एक मस्जिद में और गाँव देहात की पूरी बस्ती की किसी एक मस्जिद में कोई एक आदमी भी एतिकाफ़ करेगा तो सुन्नत सब की तरफ़ से अदा हो जाएगी। अगर कोई भी एतिकाफ़ न करे तो सब गुनहगार होंगे।



[3] जिस मोहल्ले या बस्ती में एतिकाफ़ किया गया है, उस मोहल्ले और बस्ती वालों की तरफ़ से सुन्नत अदा हो जाएगी अगरचे एतिकाफ़ करने वाला दूसरे मोहल्ले का हो।



[4] आख़िरी अशरे के चंद दिन का एतिकाफ़, एतिकाफ़-ए-नफ़्ल है, सुन्नत नहीं।



[5] औरतों को मस्जिद के बजाए अपने घर में एतिकाफ़ करना चाहिए।



[6] सुन्नत एतिकाफ़ की दिल में इतनी नीयत काफ़ी है कि मैं ﷲ तआला की रज़ा के लिए रमज़ान के आख़िरी अशरे का मसनून एतिकाफ़ करता हूँ।



[7] किसी शख्स को उजरत दे कर एतिकाफ़ बिठाना जाइज़ नहीं।



[8] मस्जिद में एक से ज़ाइद लोग एतिकाफ़ करें तो सब को सवाब मिलता है।



[9] मसनून एतिकाफ़ की नीयत बीस तारीख के गुरुब-ए-शम्स से पहले कर लेनी चाहिए, अगर कोई शख्स वक़्त पर मस्जिद में दाखिल हो गया लेकिन उस ने एतिकाफ़ की नीयत नहीं की और सूरज गुरुब हो गया तो फिर नीयत करने से एतिकाफ़ सुन्नत नहीं होगा।



[10] एतिकाफ़-ए-मसनून के सही होने के लिए मंदर्जे ज़ैल चीज़ें ज़रूरी हैं



1) मुसलमान होना
2) आक़िल होना
3) एतिकाफ़ की नीयत करना
4) मर्द का मस्जिद में एतिकाफ़ करना
5) मर्द और औरत का जनाबत यानी ग़ुस्ल वाजिब होने वाली हालत से पाक होना। ये शर्त एतिकाफ़ के जाइज़ होने के लिए है लिहाज़ा अगर कोई शख्स हालत-ए-जनाबत में एतिकाफ़ शुरू कर दे तो एतिकाफ़ तो सही हो जाएगा लेकिन ये शख्स गुनाहगार होगा।
6) औरत का हैज़ व निफ़ास से ख़ाली होना
7) रोज़े से होना। अगर एतिकाफ़ के दौरान कोई एक रोज़ा न रख सके या किसी वजह से रोज़ा टूट जाए तो मसनून एतिकाफ़ भी टूट जाएगा।



[11] अगर किसी शख्स ने पहले दो अशरों में रोज़े न रखे हों या तरावीह न पढ़ी हो तो वो भी एतिकाफ़ कर सकता है।



[12] जिस शख्स के बदन से बदबू आती हो या ऐसा मर्ज़ हो जिस की वजह से लोग तंग होते हों तो ऐसा शख्स एतिकाफ़ में न बैठे अलबत्ता अगर बदबू थोड़ी हो जो खुशबू वगैरा से दूर हो जाए और लोगों को तकलीफ़ न हो, तो जाइज़ है।



📚एतिकाफ़ कोर्स सफ़्हा 19-21