*कयामत की निकटता के फितने नबवी हदीसों की रोशनी में*

✍🏻*मुहम्मद आदिल अररियावी*
11 सफर-उल-मुजफ्फर 1448 हिजरी
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अल्हम्दुलिल्लाह, इस्लाम धर्म एक ऐसा पूर्ण जीवन संहिता है जो हर युग के मनुष्यों को फितनों से मुक्ति का मार्ग दिखाता है। जब भी दुनिया में गुमराहियत, ज़ुल्म और फितनों की आवाज़ बुलंद हुई, कुरान करीम और नबवी हदीसों ने ईमान वालों का मार्गदर्शन किया और उन्हें सत्य पर अडिग रहने की शिक्षा दी है। आज का वर्तमान युग भी अनगिनत फितनों, वैचारिक अराजकता और ईमान की परीक्षाओं का युग है, जिसमें हर ईमान वाले के लिए आवश्यक है कि वह कयामत की निकटता के संकेतों, फितनों की वास्तविकता और उनसे सुरक्षा के नबवी तरीकों से अवगत हो। यही बुद्धिमानी मनुष्य को गुमराहियत से सुरक्षित रखती है, ईमान को मज़बूत बनाती है और आखिरत की सफलता का मार्ग आसान करती है।
यदि हम आज वर्तमान युग की अशांत स्थितियों पर एक सरसरी नज़र डालें, तो यह बात किसी भी समझदार व्यक्ति से छिपी नहीं है कि आज हर तरफ फितने अपने चरम पर हैं। गुनाहों का एक सिलसिला जारी है जिसने हर किसी को अपनी चपेट में ले रखा है। हत्या, लूटपाट, ज़ुल्म और सितम का दौर है। गुटबाजी ने मुसलमानों की एकता और सामूहिक शक्ति को बिखेर दिया है। शारीरिक इच्छाओं और दुनिया के सुखों में डूबना बढ़ता जा रहा है। इन सभी स्थितियों को देखकर हमें यह विश्वास करने में ज़रा भी संकोच नहीं होता कि यह वही फितनों का दौर है जिसकी ओर अंतिम नबी मुहम्मद अरबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने स्पष्ट रूप से भविष्यवाणियां की हैं, जो साढ़े चौदह सौ साल बाद अक्षरशः सच साबित हो रही हैं। आपने इससे सुरक्षा के लिए दिशा-निर्देश निर्धारित किए हैं। महान हदीस विद्वानों ने 'अबवाब-उल-फितन' या 'किताब-उल-फितन' के शीर्षक से इन सभी हदीसों का उल्लेख किया है।
कयामत आने का विश्वास इस्लाम का बुनियादी विश्वास है। कयामत आने के समय को अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने तमाम सृष्टि से गुप्त रखा है, अलबत्ता नबी अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अपनी उम्मत के लिए कयामत के संकेत बता दिए हैं ताकि उम्मत कयामत से जागरूक और चिंतित रहे। नबवी हदीसों में स्पष्टता के साथ मौजूद है कि जब कयामत का समय निकट आएगा, तो एक के बाद एक फितनों की बारिश होगी। हर आने वाला समय अपने पिछले समय से अधिक बुरा और बुराई वाला होगा। दज्जाल के फितनों की शरारतें ज़ोरों पर होंगी। मुसलमान परीक्षा की अत्यंत कठिन घाटियों से गुज़रेंगे। ईमान की रक्षा करना कठिन से कठिनतर हो जाएगा। इसके बाद हज़रत महदी का प्रकट होना और हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) का अवतरण होगा, और वे दज्जाल और दज्जाल के फितनों का खात्मा करेंगे।
यदि गौर और फिक्र की नज़र से देखा जाए तो मालूम होगा कि कदम-कदम पर अनगिनत फितनों ने जन्म ले रखा है। हर तरफ ईमान पर हमले हो रहे हैं। असत्य के पुजारी नए-नए अंदाज़ में सत्य को मिटाने की नापाक कोशिश कर रहे हैं। गुनाहों को खूबसूरत बनाकर पेश किया जा रहा है और धर्म से दूरी को प्रगति का नाम दिया जा रहा है। ऐसी स्थितियों में हर मुसलमान पर अनिवार्य है कि वह अपने ईमान और अकीदे की रक्षा की चिंता करे, फितनों की वास्तविकता को समझे और उन मुबारक शिक्षाओं को मज़बूती से थाम ले जो खातम-उल-अंबिया हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अपनी उम्मत को आने वाले फितनों से बचने के लिए प्रदान की हैं। यही वह रास्ता है जो मनुष्य को गुमराहियत के अंधेरों से निकालकर हिदायत की रोशनी तक पहुँचाता है।
कयामत की निकटता की इन तमाम आपदाओं से बचने के लिए आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने स्पष्ट और विचारोत्तेजक शब्दों में उम्मत के लिए उपाय प्रदान किए हैं। ये सभी उपाय और मार्गदर्शन इस फितनों के दौर में हमारे लिए प्रकाश स्तंभ और मार्गदर्शन हैं, जिनसे परीक्षाओं के हर रास्ते में रोशनी का प्रबंध होता रहेगा।
यह समय नबूवत के बाद और कयामत की निकटता का है। ईमान को झकझोरने वाली और दिल दहला देने वाली बातें और नास्तिकता व धर्मत्याग की घटनाएं दिन-ब-दिन अधिकता से सुनने और देखने में आ रही हैं। इस प्रकार के फितनों की भविष्यवाणी स्वयं दोनों जहानों के सरदार (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने कर रखी है। आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का पवित्र कथन है:
सैय्यदना हज़रत अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) रिवायत करते हैं कि नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया है: "नेक कामों में जल्दी करो फितनों के आने से पहले। सुबह एक व्यक्ति मोमिन होगा और शाम होते-होते काफिर हो जाएगा, और शाम को एक व्यक्ति मोमिन होगा और सुबह होते-होते काफिर हो जाएगा। वह अपने दीन को दुनिया के बदले बेच देगा।" इस प्रकार के फितनों से आमतौर पर वही मुसलमान प्रभावित होता है जिसके सामने इस्लामी अकीदे और धार्मिक जानकारी नहीं होती।
(इसे मुस्लिम ने अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है)। कयामत और कयामत के संकेतों को सही तरीके से स्वीकार करना ईमान का अनिवार्य हिस्सा है। यदि इसमें ज़रा भी कमी की गई, तो अल्लाह के यहाँ उसका ईमान मान्य नहीं होगा।
अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त हमें हर ज़ाहिर और बातिन फितनों से सुरक्षित रखे, ईमान पर अडिगता प्रदान करे, कुरान और सुन्नत पर चलने का सौभाग्य दे और हमारा अंत ईमान पर करे। आमीन या रब्बुल आलमीन।