अल्लाह रब्बुल इज्जत ने इंसान को बेशुमार सलाहियतों और नेमतों से नवाजा है। इनमें सबसे बड़ी नेमत सेहत है, मगर अगर किसी इंसान को किसी जिस्मानी या जेहनी आज़माइश का सामना हो तो क्या वह अपनी जिंदगी में कामयाब नहीं हो सकता?
क्या माज़ूरी इंसान के हौसले को पस्त कर सकती है?
नहीं! तारीख गवाह है कि बहुत से ऐसे अफराद जिन्हें लोग "माज़ूर" समझते थे, उन्होंने अपने अज़्म और हिम्मत से दुनिया के धारे को बदल कर रख दिया।
माज़ूरी आज़माइश या रहमत?
अल्लाह ताला फरमाता है:
لَا یُكَلِّفُ اللّٰهُ نَفْسًا اِلَّا وُسْعَهَاؕ-لَهَا مَا كَسَبَتْ وَ عَلَیْهَا مَا اكْتَسَبَتْؕ-رَبَّنَا لَا تُؤَاخِذْنَاۤ اِنْ نَّسِیْنَاۤ اَوْ اَخْطَاْنَاۚ-رَبَّنَا وَ لَا تَحْمِلْ عَلَیْنَاۤ اِصْرًا كَمَا حَمَلْتَهٗ عَلَى الَّذِیْنَ مِنْ قَبْلِنَاۚ-رَبَّنَا وَ لَا تُحَمِّلْنَا مَا لَا طَاقَةَ لَنَا بِهٖۚ-وَ اعْفُ عَنَّاٙ-وَ اغْفِرْ لَنَاٙ-وَ ارْحَمْنَاٙ-اَنْتَ مَوْلٰىنَا فَانْصُرْنَا عَلَى الْقَوْمِ الْكٰفِرِیْنَ۠
[सूरह बकरा 286]
तर्जुमा-ए-कंजुल ईमान:
अल्लाह किसी जान पर बोझ नहीं डालता मगर उसकी ताकत भर उसका फायदा है जो अच्छा कमाया और उसका नुकसान है जो बुराई कमाई ऐ रब हमारे हमें न पकड़ अगर हम भूलें या चूकें ऐ रब हमारे और हम पर भारी बोझ न रख जैसा तूने हमसे अगलों पर रखा था ऐ रब हमारे और हम पर वह बोझ न डाल जिसकी हमें सहार न हो और हमें माफ फरमा दे और बख्श दे और हम पर मिहर कर तू हमारा मौला है, तो काफिरों पर हमें मदद दे।
यह आयत वाज़ेह करती है कि अल्लाह ताला इंसान पर वही आज़माइश डालता है जिसको वह सहने की सलाहियत रखता है।
माज़ूरी कोई कमजोरी नहीं बल्कि अल्लाह रब्बुल इज्जत की तरफ से एक आज़माइश है जिसके जरिए इंसान को अपनी सलाहियतों को निखारने का मौका मिलता है।
अंबिया-ए-किराम अलैहिमुस्सलाम की आज़माइशें:
कुरान मजीद में कई अंबिया-ए-किराम अलैहिमुस्सलाम के ऐसे वाकयात बयान किए गए हैं जिन्होंने जिस्मानी आज़माइशों के बावजूद अपनी जद्दोजहद जारी रखी।
हजरत अय्यूब अलैहिस्सलाम की बीमारी
अल्लाह ताला फरमाता है:
وَ اَیُّوْبَ اِذْ نَادٰى رَبَّهٗۤ اَنِّیْ مَسَّنِیَ الضُّرُّ وَ اَنْتَ اَرْحَمُ الرّٰحِمِیْنَ
[सूरह अंबिया: 83]
तर्जुमा-ए-कंजुल ईमान:
और अय्यूब को जब उसने अपने रब को पुकारा कि मुझे तकलीफ पहुंची और तू सब मिहर वालों से बढ़कर मिहर वाला है।
अल्लाह ताला ने उनकी दुआ कुबूल फरमाई और उनकी तकलीफ को दूर फरमा दिया। यह वाकिया हमें सिखाता है कि आज़माइशों में सब्र व दुआ का दामन न छोड़ें।
हजरत याकूब अलैहिस्सलाम की बीनाई
अल्लाह ताला फरमाता है:
وَ تَوَلّٰى عَنْهُمْ وَ قَالَ یٰۤاَسَفٰى عَلٰى یُوْسُفَ وَ ابْیَضَّتْ عَیْنٰهُ مِنَ الْحُزْنِ فَهُوَ كَظِیْمٌ(84)قَالُوْا تَاللّٰهِ تَفْتَؤُا تَذْكُرُ یُوْسُفَ حَتّٰى تَكُوْنَ حَرَضًا اَوْ تَكُوْنَ مِنَ الْهٰلِكِیْنَ
[सूरह यूसुफ:85]
तर्जुमा-ए-कंजुल ईमान:
और उनसे मुंह फेरा और कहा हाय अफसोस यूसुफ की जुदाई पर और उसकी आंखें गम से सफेद हो गईं तो वह गुस्सा खाता रहा। बोले खुदा की कसम आप हमेशा यूसुफ की याद करते रहेंगे यहां तक कि गोर किनारे जा लगें या जान से गुजर जाएं।
हजरत याकूब अलैहिस्सलाम ने बीनाई खो दी, मगर अल्लाह रब्बुल इज्जत के वादे पर यकीन रखते हुए सब्र किया और आखिरकार अल्लाह रब्बुल इज्जत ने उनकी बीनाई लौटा दी।
माज़ूर शख्सियतों के कारनामे:
हजरत अब्दुल्लाह बिन उम्मे मक्तूम रज़ी अल्लाहु अन्हु
यह जलीलुल कद्र सहाबी नाबीना थे, मगर नबी करीम ﷺ ने उन्हें मदीना मुनव्वरा में अपनी गैर मौजूदगी में इमामत का फरीजा सौंपा।
हदीस शरीफ में आता है:
عن أنس بن مالك رضي الله عنه أن رسول الله ﷺ استخلف ابن أم مكتوم على المدينة مراراً۔
[सहीह मुस्लिम: 1334]
हजरत अनस बिन मालिक रज़ी अल्लाहु अन्हु से मरवी है कि रसूल अल्लाह ﷺ ने हजरत इब्न उम्मे मक्तूम रज़ी अल्लाहु अन्हु को कई मर्तबा मदीना में अपना जानशीन बनाया।
इमाम शातिबी रहमतुल्लाह अलैह
आप नाबीना थे मगर उलूम कुरानी में महारत रखते थे। उनकी लिखी गई हर्ज़ुल अमानि आज भी इल्म किरात में बुनियादी हैसियत रखती है।
शेख अहमद यासीन रहमतुल्लाह अलैह
आप का पूरा जिस्म मफलूज था मगर फलस्तीन में हुर्रियत की तहरीक के बानी थे।
बुलंदी-ए-हौसला का राज:
अल्लाह ताला फरमाता है:
وَ مَنْ یَّتَّقِ اللّٰهَ یَجْعَلْ لَّهٗ مَخْرَجًاۙ
[सूरह इतलाक:2]
तर्जुमा-ए-कंजुल ईमान:
और जो अल्लाह से डरे अल्लाह उसके लिए नजात की राह निकाल देगा।
यह आयत हमें यह यकीन दिलाती है कि माज़ूरी या कोई भी आज़माइश इंसान को अल्लाह रब्ब की मदद से कामयाबी से नहीं रोक सकती।
हकीकी माज़ूरी जिस्म की कमजोरी नहीं, बल्कि इरादे की कमजोरी है।
अल्लाह ताला हर इंसान को उसकी इस्तताअत के मुताबिक आजमाता है और जो सब्र व इस्तिकामत का मुजाहिरा करता है, अल्लाह रब्बुल इज्जत उसे बुलंद मकाम अता फरमाता है।