वैलेंटाइन डे (Valentine's Day) हर साल 14 फरवरी को मनाया जाने वाला पश्चिमी त्योहार, हवस के पुजारियों का आलमी त्योहार है। इसका दूसरा नाम Feast of Saint Valentine भी है। इसके वजूद के मुताल्लिक कोई मुस्तनद तारीखी हवाला मौजूद नहीं, हालांकि एक गैर मुस्तनद ख्याली दास्तान मौजूद है। तीसरी सदी ईसवी में एक वैलेंटाइन नाम का पादरी था, जो एक राहबा के इश्क में मुब्तिला था। चूंकि मसीहियत में राहबों के लिए निकाह ममून था, इसलिए एक दिन वैलेंटाइन ने अपनी माशूका को खुश करने के लिए यह कहा कि उसे ख्वाब में बताया गया है कि 14 फरवरी का दिन ऐसा है जिसमें राहब या राहबा صنفی मिलाप कर सकते हैं और यह गुनाह नहीं होता। राहबा ने इस बात पर यकीन कर लिया और दोनों इश्क में मुब्तिला हो गए। लेकिन इस्लाम हमें ऐसी बे राह रवी की इजाजत नहीं देता।
قُلْ لِّلْمُؤْمِنِیْنَ یَغُضُّوْا مِنْ اَبْصَارِهِمْ وَ یَحْفَظُوْا فُرُوْجَهُمْؕ-ذٰلِكَ اَزْكٰى لَهُمْؕ-اِنَّ اللّٰهَ خَبِیْرٌۢ بِمَا یَصْنَعُوْنَ
[سورہ نور:30]

 तरजुमा-ए-कंजुल ईमान

मुसलमान मर्दों को हुक्म दो अपनी निगाहें कुछ नीची रखें और अपनी शर्मगाहों की हिफाजत करें यह उनके लिए बहुत सुथरा है बेशक अल्लाह को उनके कामों की खबर है।


यौम-ए-अहमकान (April Fool's Day) पहली अप्रैल को मनाया जाने वाला यह पश्चिमी त्योहार है, जिसमें झूठ बोल कर लोगों को बेवकूफ बनाया जाता है। हालान कि कुरान ने झूठ बोलने वालों पर लानत की है। कितनी अफसोस की बात है कि हंसी मजाक की लज्जत के लिए, एक इंसान दूसरे इंसान को धोखा देता है और लोगों के दरमियान उसे जलील करता है। "अल्लाहु अकबर! इस्लामी तालीमात का इस दिन मजाक उड़ाया जाता है!" हिंदुस्तान में अप्रैल फूल मनाने वाले मुसलमान, यहूद व नसारा की तहजीब व तमद्दुन को अपना कर, इस्लाम के अहकाम को पस-ए-पुश्त डाले हुए हैं।

कारीईन किराम: बहुत माज़रत के साथ, इन तमाम बातों से बचने की कोशिश करें और वक्त की संगीनी को समझते हुए अपने बच्चों को आने वाले दौर के लिए तैयार करें। ज़ेहनी, जिस्मानी और रूहानी तौर पर उनकी तरबियत करें, ताकि वह मुश्किल और नामुसाद हालात में भी बर्दाश्त कर सकें। आगे आने वाला दौर मुश्किलात और जंगों का दौर होगा। हमें सख्त तरीन हालात का सामना करना पड़ेगा, यह कोई फर्ज़ी बात नहीं है। हालात आप सब के सामने हैं। आका करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने पहले ही इन हालात की खबर दे दी थी। ऐसे हालात होंगे, लेकिन वही बचेगा जो चौकन्ना होगा, दानिशमंदी, ईमान, और अमल को इख्तियार करे। इसलिए ईमानी, जिस्मानी, रूहानी, असाबी मजबूती बहुत जरूरी है। अगर जिंदा रहना है और तमाम फितनों से बचना है तो मुसलमान होश में आ जाएं!

जो दीन कि हमदर्द बनी नौ-ए-बशर था अब जंग व जिदाल चार तरफ इस में बपा है फरियाद है ऐ किश्ती उम्मत के निगहबां बेड़ा यह तबाही के करीब आन लगा है