ख़त्म-ए-नबूवत ज़िंदाबाद

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अस्सी साल का बूढ़ा


 

तहरीक-ए-ख़त्म-ए-नबूवत १९५३ ईस्वी में दिल्ली दरवाज़े लाहौर के बाहर सुबह से असर तक जुलूस निकलते रहे, लोग दीवाना वार आक़ा-ए-नामदार सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की इज्ज़त व नामूस की हिफ़ाज़त पर जान क़ुर्बान करते रहे। असर के बाद जब जुलूस निकलने बंद हो गए तो अस्सी साल का बूढ़ा अपने मासूम सात साला पोते को कंधे पर उठा कर लाया, दादा ने ख़त्म-ए-नबूवत का नारा लगाया, मासूम बच्चे ने जो दादा से सबक पढ़ा था, उसी के मुताबिक ज़िंदाबाद कहा, दो गोलियां आईं, अस्सी साल के बूढ़े और सात साला बच्चे के सीने से शाएं करके गुज़र गईं, दोनों शहीद हो गए, मगर तारीख में एक नए बाब का इज़ाफ़ा कर गए कि अगर आक़ा-ए-नामदार सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की इज्ज़त व नामूस पर मुश्किल वक़्त आए तो मुसलमानों के अस्सी साला बूढ़े ख़मीदा कमर से ले कर सात साला बच्चे तक सब अपनी जान दे कर अपने आक़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की इज्ज़त व नामूस की हिफ़ाज़त करते हैं।